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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 175
एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारेऽस्मिन् वल्लभो से भवेत्सः । पापान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तारयत्यद्भुतं वै ।।
शिवजी बोले - हे देवि! ब्रह्मरन्ध्र का ध्यानकर्ता प्राणी मेरा प्रियपात्र बन जाता है तथा वह पाप-पुंजों को विजित कर मोक्षमार्गगामी हो जाता है। वह अपने ज्ञानोपदेश द्वारा अन्य मोक्षार्थियों का भी सांसारिक आवागमन से उद्धार कर दिया करता है।
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