अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
स्नानाचरणमात्रेण पूतो भवति नान्यथा ।।
वे पवित्रा अथवा अपवित्रा अवस्था में रहकर भी इस संगम-स्नान से पूर्णतया पवित्र हो जाते हैं। इस बात को कभी मिथ्या नहीं जानना चाहिए।
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