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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 19
समबुद्धि क्षमायुक्तः पुण्यकांक्षी प्रियंवदः । मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामान्यः स्यान्न संशयः । एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः ।।
जो साधक सामान्य बुद्धि, क्षमाशील, पुण्यकर्म करने का अभिलाषी, मृदुभाषी तथा समस्त विषयों या कार्यों में तटस्थ रहने वाला हो उसे मध्यम साधक कहा जाता है। इस प्रकार के लक्षणान्वित अभ्यासरत साधक को देखकर गुरु उसे लययोग की शिक्षा प्रदान करे, क्योंकि लययोग की साधना ही मुक्तिद्वार का एकमात्र साधन होता है।
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