जो साधक सामान्य बुद्धि, क्षमाशील, पुण्यकर्म करने का अभिलाषी, मृदुभाषी तथा समस्त विषयों या कार्यों में तटस्थ रहने वाला हो उसे मध्यम साधक कहा जाता है। इस प्रकार के लक्षणान्वित अभ्यासरत साधक को देखकर गुरु उसे लययोग की शिक्षा प्रदान करे, क्योंकि लययोग की साधना ही मुक्तिद्वार का एकमात्र साधन होता है।
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