दूसरे रस से सप्तधातुओं से संयुक्त पिण्ड का परिपोषण हुआ करता है तथा तीसरा रस सप्तधातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) से पृथक् मल-मूत्रादि के रूप में होता है।
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