उसमें समस्त पदार्थों का ज्ञान स्वयं ही आ जाता तथा वह त्रिकालदर्शी बन जाता है। जिन शास्त्रों के श्रवण करने का उसे कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ होता उन्हें भी वह सांगोपांग रूप से जान लेता है।
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