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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 129
ब्रह्मरन्द्रे हि यत् पट्टां सहस्रारं व्यवस्थितम् । तत्र कन्दे हि या योनि तस्यां चन्द्रोव्यवस्थितः ।।
ब्रह्मरन्ध्रस्थ सहस्रसार कमल कंद में अवस्थित योनि में सदैव ही चन्द्रमा सुशोभित रहता है।
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