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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 208
को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्येत्सदा हि सः । एतत् करोति यो नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः । स एव योगो सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ।।
वह समस्त सांसारिक पदार्थों को आत्मवत् ही समझता है। जिसके मन से बंधन और मोक्ष का भेद मिट जाता है तथा जो नित्य ही आत्मदर्शन हेतु चिन्तनशील रहता है वह निश्चय ही मोक्ष का भागी होता है। ऐसा योगी उत्तम भक्त कहलाता और समस्त भुवनों में पूज्य माना जाता है।
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