को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्येत्सदा हि सः ।
एतत् करोति यो नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः ।
स एव योगो सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ।।
वह समस्त सांसारिक पदार्थों को आत्मवत् ही समझता है। जिसके मन से बंधन और मोक्ष का भेद मिट जाता है तथा जो नित्य ही आत्मदर्शन हेतु चिन्तनशील रहता है वह निश्चय ही मोक्ष का भागी होता है। ऐसा योगी उत्तम भक्त कहलाता और समस्त भुवनों में पूज्य माना जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।