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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 222
गुहौव क्रियतेऽभ्यासः सङ्गं त्यक्त्वा तदन्तरे । व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसंगो न रागतः ।।
उसे संगरहित होकर सुनसान स्थान में अपनी साधना का अभ्यास करना उचित है। उसे संसारी व्यक्तियों से उतना ही व्यवहार रखना चाहिए जितना आवश्यक हो।
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