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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 216
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ।।
यह ब्रह्म, मन और वाणी से सदा परे होता है। योगसाधन तथा स्वच्छ ज्ञान के द्वारा वह स्वतः ही आलोकित होने लगता है, यह कथन अटल सत्य है।
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