मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खाद्यते ।
तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादिगुणप्रदा ।।
इस प्रकार की साधना के परिणामस्वरूप साधक कालजयी बन जाता है। उसका वध किसी प्रकार से भी सम्भव नहीं होता। उसे गुणप्रदायिनी अणिमादिक अष्ट सिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्य, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व) की उपलब्धि हो जाती है।
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