अर्थात् योगग्रहणकाल में साधक का शरीर दिव्यकाय बन जाता है। उसकी समस्त व्याधियाँ तथा अज्ञानता दूर हो जाती है। अभिप्राय यह है कि योग ग्रहण के समय साधक को इस बात की चिन्तना करनी चाहिए कि अब मैं पूर्व शरीर को छोड़कर दिव्यशरीर में प्रविष्ट हो गया हूँ।
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