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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 238
जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विषये स्थिताः । आगच्छन्ति यथा तीर्थं विमुक्तकुलविग्रहाः । सर्वस्वं तस्य ददति तस्यैव च वशे स्थिताः ।।
इस मंत्रजाप को दो लाख की संख्या में पूरा करने वाले जापक के निकट कुलांगनाएँ भी उसी प्रकार गमन करती हूं जिस प्रकार वे किसी तीर्थस्थान में निःसंकोच भाव से करती हैं। अर्थात् ऐसी नारियाँ भी उस साधक को अपना सर्वस्व लुटा देती हैं।
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