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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 92
यं यं कामयते चित्ते तं तं फलमवाप्नुयात् । निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम् ।।
जो साधक इस मूलाधार पद्म का ध्यान धारण करते हुए जिन-जिन पदार्थों की अभिलाषा करता है उसे उन सभी इच्छित पदार्थों की उपलब्धि होती है। इसके अभ्यास में सर्वदा तत्पर रहने वाले योगी निश्चय ही मोक्ष-प्रदायक आत्म-दर्शन करने में सफल होते हैं।
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