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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 202
ध्यानादेव विजानाति विचित्रफलसम्भवम् । अणिमादिगुणोपेतो भवत्येव न संशयः ।।
इसकी महत्ता को जानने वाले योगी मेरे ही समतुल्य होते हैं। इसकी साधना करने से निश्चय ही साधक को अष्टसिद्धियों की उपलब्धि होती है।
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