पश्चिमाभिमुखी योनिगुदमेड्रान्तरालगा ।
तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा ।।
गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में अवस्थित योनि पीछे की ओर मुख वाली होती है। उसी स्थान में वह कन्द वर्तमान रहता है और वही कुंडलिनी शक्ति का आवासीय स्थान भी होता है।
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