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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 243
तथाष्टादशभिर्लक्षैर्देहेनानेन साधकः । उत्तिष्ठेन्मेदिनीं त्यत्क्त्वा दिव्यदेहस्तु जायते । भ्रमते स्वेच्छ्या लोके छिद्रां पश्यति मेदिनीम् ।।
उक्त कथित विधि से अट्ठारह लाख मंत्रजाप करने वाले साधक में देह की दिव्यता आ जाती है। वह भूमि से ऊपर उठकर इच्छानुसार आकाश में चक्कर लगा सकता है। वह भूमि-विवर का अवलोकन करने में भी सक्षम हो जाता है। आशय यह है कि वह पाताल-प्रवेश के मार्गों को देखने की क्षमता पा लेता है।
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