जब समस्त नाड़ियों में रस का संचरण होता है, तब उसके परिणामस्वरूप पूरे शरीर में अन्न द्वारा परिवर्तित रस प्रवृत्त हो उठता है। अर्थात् अन्न-रस के द्वारा ही शरीर का पुष्टिकरण सम्भव होता है।
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