एतज्ज्ञानं सदा काय योगिना सिद्धिमिच्छता ।
निरन्तरकृताभ्यासान्मम तुल्यो भवेद् ध्रुवम् ।
एतज्ज्ञानबलाद्योगी सर्वेषां वल्लभो भवेत् ।।
इस ध्यान का निरन्तर अभ्यास करना सिद्धाभिलाषी पुरुषों के लिए आवश्यक होता है। हे पार्वति! इसका ध्यान सदैव करने वाला योगी मेरे समतुल्य हो जाता है। इस ज्ञान की प्रभावशालिता के कारण निश्चय ही वह साधक त्रैलोक्य का प्रियभाजन बन जाता है। अर्थात् उसका कोई भी प्राणी विद्रोही नहीं रह जाता।
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