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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 224
एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोऽपिं यदा चरेत् । तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।
यदि कोई गृहस्थाश्रमी स्थिरचित्त से स्वगृह में ही योगसाधना करे तो उसे भी निःसन्देह रूप से सिद्धि सुलभ हो सकती है। इसमें किसी प्रकार का सोच-विचार करना अनावश्यक होता है।
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