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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 125
तुरीयं त्रितयं लिङ्ग तदाहं मुक्तिदायकः । ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्सयो भवति ध्रुवम् ।।
शिवजी ने कहा - हे पार्वति! उस स्थान में तुरीयावस्था वाले तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिप्रदाता मैं स्वयं ही विराजमान रहा करता हूँ। इसके ध्यानमात्र से साधक मेरे समान योगीन्द्र बन जाता है। अर्थात् जो योगी तुरीयावस्था में तृतीय लिंगरूप मेरा ध्यान करता है वह सायुज्य मुक्ति (सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य-इन चार प्रकार की मुक्तियों में से एक। सायुज्य मुक्ति में साधक परमात्म-स्वरूप होकर उसी में समा जाता है) पाने का अधिकारी बन जाता है।
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