हे पार्वति! ब्रह्मरन्ध्र में मन को स्थिर रखने वाला योगाभ्यासी अणिमादिक सिद्धियों का भोक्ता बनकर स्वेच्छया मुझमें ही विलीन हो जाता है। अर्थात् इस प्रकार के अभ्यास द्वारा सिद्धाभिलाषी सिद्धि को तथा मोक्षाभिलाषी मोक्ष को प्राप्त कर लिया करता है।
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