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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 135
तत् सूर्यमण्डलद्वारं विषं क्षरति सन्ततम् । पिंगलायां विषं तत्र समर्थयति तापनः ।।
उस सूर्यमण्डल से लगातार विष का क्षरण होता रहता है।
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