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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 232
एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्ध्वा न द्रुतं न विलम्बितम् । अक्षराक्षरसन्धानं निःसंदिग्धमना जपेत् ।।
मंत्रों का जप द्रुत-विलम्बित (कभी शीघ्र या कभी देर से) रूप से न करके प्रत्येक अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए स्थिरचित्त से मन्त्रोच्चार करना आवश्यक बतलाया गया है।
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