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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 2
ईश्वर उवाच- शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यथा विघ्नः स्थिताः सदा । मुक्तिं नराणां च भोगः परमबन्धनः ।।
शिवजी बोले - हे देवि! योगसाधना काल में साधक के सम्मुख जो-जो बाधाएँ आती हैं, उन्हें तुम एकाग्रतापूर्वक श्रवण करो। मनुष्यों के मोक्षमार्ग में भोग ही सबसे बड़ा बाधक होता है। इसके बन्धन में आबद्ध हो जाने के परिणामस्वरूप वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में असफल सिद्ध हो जाता है।
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