ईश्वर उवाच-
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यथा विघ्नः स्थिताः सदा ।
मुक्तिं नराणां च भोगः परमबन्धनः ।।
शिवजी बोले - हे देवि! योगसाधना काल में साधक के सम्मुख जो-जो बाधाएँ आती हैं, उन्हें तुम एकाग्रतापूर्वक श्रवण करो। मनुष्यों के मोक्षमार्ग में भोग ही सबसे बड़ा बाधक होता है। इसके बन्धन में आबद्ध हो जाने के परिणामस्वरूप वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में असफल सिद्ध हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।