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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 177
पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्त्रारे सरोरुहे । तस्याधो वर्तते चन्द्रस्तद्ध्यानं क्रियते बुधैः ।।
इस अगम्य पथ का पथिक बनना ब्रह्मादि देवों के लिए भी दुष्कर कार्य होता है। मैंने पूर्व में सहस्रार पद्म के मध्य में जिस योनिमंडल को बतलाया है, उसी के नीचे चन्द्रमा का अवस्थान है। इस चन्द्रमा का ध्यान प्रबुद्ध योगी सदा ही किया करते हैं।
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