पूर्वकथित रीति से शरीर के बाहरी भाग में अपने प्रतीक स्वरूप का साधक को ध्यान करना उचित है। जब ध्यानावस्था में चित्त का स्थिरीकरण हो जाय तब उसे महान शून्य का चिन्तन करना आवश्यक होता है।
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