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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 93
बहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पूजनीय प्रयत्नतः । ततः श्रेष्ठतमं होतन्त्रान्यदस्ति मतं मम ।।
हे पार्वति! वह आत्मा निश्चय ही बाह्याभ्यन्तर रूप से प्रयत्नपूर्वक पूजनीय होता है, ऐसा मेरा अभिमत है। इससे बढ़कर अन्य कोई भी योग नहीं है।
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