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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 253
तस्मात् क्रियाविधानेन कर्तव्या योगपुङ्गवैः । यदृच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंगकः ।।
विधिपूर्वक किये जाने वाले सत्कर्म से अभीप्सित फल की प्राप्ति सम्भव होती है। इसके अनुष्ठानकर्ता को कभी इन्द्रियासक्त नहीं होना चाहिए।
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