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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 49
विप्रान् सन्तोष्य मेधावी नानामङ्गलसंयुतः । ममालये शुचीर्भूत्वा गृह्णीयाच्छुभमात्मनः ।।
तदनन्तर पवित्रतापूर्वक शिवमन्दिर में बैठकर आत्म-विषयक योग को ग्रहण करे । इस विधि से साधक गुरु के अनुग्रह को प्राप्त कर अपने पूर्व शरीर को त्याग दिव्यशरीर में आकर योगोपदेश ग्रहण करे।
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