इस विषय में सोच-विचार की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। निरन्तर छह मास तक इसके अभ्यास के फलस्वरूप साधक में ऐसी सिद्धि आ जाती है कि उसका प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट हो जाता है।
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