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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 133
ततो द्वयमिह स्थाने वाराणस्यान्तु चिन्तयेत् । तदाकारा पिङ्गलापितदाज्ञाकमलोत्तरे । दक्षनासापुटे याति प्रोक्तास्माभिरसीति वै ।।
अतः इड़ा और पिंगला नाड़ी के मध्यवर्ती स्थान को वाराणसी समझकर चिन्तना करनी चाहिए। इस इड़ा नाड़ी की भाँति पिंगला नाड़ी भी आज्ञाचक्र के वाम भाग से चलकर दाएँ नासापुट में चली जाती है। अतएव हे देवि! इसी कारण मैंने पिंगला का असी नामकरण किया है।
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