इसके द्वारा ही वाणी की सिद्धि मिलती है। यही विश्व की बीजस्वरूपा भी है। यह कुंडलिनी ही नगदाधार विष्णु को परम शक्ति तथा तप्त कांचन के समान निर्मल तेजयुक्ता होती है। यह सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणों की उत्पन्नकर्शी होती है।
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