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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 194
यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्तिर्विलीयते । तस्मिन्परिश्रमं योगी करोति निरपेक्षकः ।।
इस सहस्रार कमल का बोध हो जाने पर मनोवृत्तियों का लय हो जाता है। इसी हेतु योगी के लिए यह अनिवार्य है कि वह इस ज्ञानोपलब्धि में निरपेक्ष भाव से सदा लगा रहे।
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