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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 62
अहर्निशं यदा चिन्तां तत्करोति विचक्षणः । सिद्धानां दर्शनं तस्य भाषणं च भवेद् ध्रुवम् ।।
इस प्रकार से जो साधक दिन-रात आत्मतत्त्वबोध के चिंतन में निरत रहा करते हैं उन्हें सिद्धजनों के दर्शन और उनसे सम्भाषण करने का सुअवसर अवश्य ही प्राप्त होता है।
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