स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः ।
निमित्तमात्रं करणे न दोषोऽस्ति कदाचन ।।
आश्रमधर्म का पालन करना भी तभी तक उचित कहा गया है जब तक उसकी आवश्यकता बनी रहे। इस प्रकार कर्म के द्वारा सम्भव होने वाले जितने भी ज्ञानादि कर्म हैं, उन्हें केवल निमित्तमात्र समझकर करने वाले को दोष का भागी नहीं बनना पड़ता।
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