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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 255
गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्गं त्यक्त्वा चान्तरे योगमार्गे । सिद्धे चिह्न वीक्ष्य पश्चाद्‌गृहस्थः क्रीडेत्सं वै सम्मतं साधयित्वा ।।
यदि स्त्री-पुत्रादि से युक्त गृहस्थाश्रमी संसर्ग का परित्यागकर भोगपथ में प्रवृत्त हो जाय तो उसमें भी सिद्धि के लक्षण भासित होने लगते तथा वह सदैव आनंदित रहकर क्रीड़ाशील रहा करता है। आशय यह है कि योगाभ्यासी को सर्वदा निःसंग रहकर जीवन-यापन करना उचित है।
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