यदि स्त्री-पुत्रादि से युक्त गृहस्थाश्रमी संसर्ग का परित्यागकर भोगपथ में प्रवृत्त हो जाय तो उसमें भी सिद्धि के लक्षण भासित होने लगते तथा वह सदैव आनंदित रहकर क्रीड़ाशील रहा करता है। आशय यह है कि योगाभ्यासी को सर्वदा निःसंग रहकर जीवन-यापन करना उचित है।
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