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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 48
जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योगविदं गुरुम् । सन्तोष्यतिप्रयत्नेन योगोऽयं गृह्यते बुधैः ।।
प्रज्ञावान योगसाधक का यह कर्तव्य है कि वह समस्त जीवादिक पदार्थों का परित्याग कर उसे योग-मर्मज्ञ गुरु को समर्पित कर दे और गुरु को भली-भाँति परितुष्ट कर उनसे योग की दीक्षा ले। योगग्राही, मनस्वी साधक का यह कर्तव्य है कि वह सर्वप्रथम वित्रों को दान-दक्षिणा से संतुष्ट कर उनसे मांगलिक अनुष्ठान सम्पन्न कराये।
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