उसके दर्शनमात्र से हो मानव सांसारिक आवागमन के चक्र में भ्रमण करने से मुक्त हो जाता है। अर्थात् उसका पुनर्जन्म पुनः सम्भव नहीं होता। स्वाधिष्ठान पथ का अनुसरण करते हुए इसका अभ्यास किया जाना चाहिए।
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