प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभोऽङ्गणे ।
आयुवृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्युः स्यात्कदाचन ।।
जो साधक स्वप्रतीकरूप अपनी प्रतिच्छाया को नभमण्डल में देखता है उसमें आयुवर्धन होता है तथा उसके निकट कभी मृत्यु नहीं जाती।
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