इस प्रक्रिया के द्वारा योगसिद्धाभिलाषी साधक के हृदयस्थल में सुखरूप निरंजन चैतन्य आत्म-प्रकाश का आभास होने लगेगा, किन्तु परिश्रम के फलस्वरूप ही योग की सिद्धि मिल सकती है।
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