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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 61
एतच्चिन्तनमात्रेण पापानां संक्षयो भवेत् । दुराचारोऽपि पुरुषो लभते परमं पदम् ।।
उस आत्मज्योति की चिन्तना करने से योगी सभी पापों से विमुक्त हो जाता है। यदि ऐसा योगी विषयासक्त भी रहा हो तो भी वह मोक्षप्राप्ति का अधिकारी बन जाता है और उसे सद्गति मिलती है।
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