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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 154
तत्रान्तरन्द्रे चिच्छक्तिः सुषुम्णाकुण्डली सदा ।।
यह कुंडलिनी, सुषुम्ना नाड़ी के विवर में सदैव ही सुशोभित रहती है।
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