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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 156
यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्रजायते । पापक्षयश्च भवति न भूयः पुरुषो भवेत् ।।
इस चित्रानाड़ी के ध्यानमात्र से ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति होती है जिसके फलस्वरूप योगाभ्यासी अपने समस्त पापों का उन्मूलन कर सांसारिक आवागमन के बंधन में नहीं आता।
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