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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 111
सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी यत्र देवता । एतस्मिन् सततं ध्यानं हृत्पाथोजे करोति यः । क्षुध्यन्ते तस्य कान्ता वै कामार्तादिव्ययोषितः ।।
जिस अनाहत नामक पद्म के सिद्ध शिवजी और अधिष्ठातृ देवी काकिनी है उस हत्कमल में जो सर्वदा ध्यानावस्थित रहते हैं उनके निकट देवांगनाएँ भी कामासक्त भाव से आती है।
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