अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्ण त्यक्त्वा भ्रमाकुलाः ।
परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ।।
श्रमातुर व्यक्ति साक्षात् ब्रह्म को छोड़कर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष के चक्कर में पड़कर भ्रमित रहा करते हैं।
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