समस्त नाड़ियों में जो प्रमुख रूप से चौदह नाड़ियाँ कही गयी है वे ही सम्पूर्ण देह-व्यापार को चलाती हैं। इन प्राण-संचारिणी नाड़ियों में सभी एक-दूसरे के समान होती हैं। अर्थात् कोई भी किसी से कम नहीं मानी जाती।
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