वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविवर्धनम् ।
आरोग्यं च पटुत्वं च सर्वज्ञत्वं च जायते ।।
इस मूलाधार चक्र की ध्यानपरावणता से शारीरिक सौन्दर्य में निखार आ जाता है तथा क्षुधाग्नि भी प्रज्वलित हो उठती है। इसके द्वारा रोगोत्पत्ति की सम्भावना नहीं रह जाती और साधक में कार्यक्षमता तथा सर्वज्ञता की उत्पत्ति होती है।
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