इस साधन के द्वारा योगी त्रिकालज्ञ बन जाता है। अर्थात् उसमें दूर शब्दश्रवण, दूरदर्शन तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म दूरस्थ वस्तुओं के अवलोकन की क्षमता आ जाती है। वह नभचारी जीवों की भाँति स्वेच्छ्या आकाश में भी उड़ान भर सकता है।
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