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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 112
ज्ञानं चाप्रतिमं तस्य त्रिकालविषयं भवेत् । दूर श्रुतिर्दूरदृष्टिः स्वेच्छया खगतां व्रजेत् ।।
इस साधन के द्वारा योगी त्रिकालज्ञ बन जाता है। अर्थात् उसमें दूर शब्दश्रवण, दूरदर्शन तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म दूरस्थ वस्तुओं के अवलोकन की क्षमता आ जाती है। वह नभचारी जीवों की भाँति स्वेच्छ्या आकाश में भी उड़ान भर सकता है।
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