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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 41
मत्तभृङ्गवेणुवीणासदृशः प्रथमो ध्वनिः । एवमभ्यासतः पश्चात् संसारध्वान्तनाशनम् । घण्टानादसमः पश्चात् ध्वनिर्मेघरवोपमः ।।
इस प्रकार से योगाभ्यास में निरत रहने पर प्रथमावस्था में साधक को मतवाले भौरों की गुनगुनाहट के समान शब्द सुनाई पड़ते हैं। पुनः बाँसुरी, बीणा आदि की झंकार-जैसे शब्द का बोध होने लगता है। तदनन्तर सांसारिक तिमिर को हटाने वाला घंटानाद जैसा शब्द श्रुतिगोचर होता है। इसके पश्चात् अन्त में मेघगर्जन-जैसी ध्वनि का अनुभव होने लगता है।
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