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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 213
ज्ञानकारणमज्ञानं यथा नोत्पद्यते भृशम् । अभ्यासं कुरुते योगी सदा सङ्गविवर्जितः ।।
जिस अभ्यास के द्वारा अज्ञान का विनाश और ज्ञान का प्रकाश होता हो वैसे अभ्यास को निःसंग होकर योगसाधक को करने चाहिए।
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